प्याज की खेती तो हर कोई करता है, लेकिन ज्यादातर पुराने तरीके से सीधे सपाट खेत में बुवाई। इससे पौधों को हवा कम मिलती है, जड़ें ठीक से नहीं फैलतीं, घास-फूस ज्यादा उगता है और गांठें छोटी-कमजोर रह जाती हैं। नतीजा पैदावार कम, रोग ज्यादा और मुनाफा घटिया। लेकिन कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुशील कुमार की सलाह है कि रिज या मेढ़ विधि अपनाएं।
इसमें खेत में ऊंची-ऊंची मेढ़ें बनाकर प्याज लगाते हैं, जिससे फसल की जड़ें मजबूत होती हैं, हवा अच्छी चलती है और गांठें मोटी-चमकदार बनती हैं। इससे पैदावार पारंपरिक तरीके से कई गुना बढ़ जाती है, लागत कम लगती है और मेहनत भी बचती है। कन्नौज जैसे इलाकों में किसान इसे अपनाकर अच्छा फायदा कमा रहे हैं।
डॉ. सुशील कुमार बताते हैं कि सपाट खेत में बुवाई से पौधों के बीच जगह कम रहती है, वायु संचार नहीं होता और नमी ज्यादा रहने से रोग लग जाते हैं। लेकिन मेढ़ बनाकर लगाने से सब कुछ बदल जाता है।
रिज मेढ़ विधि के मुख्य फायदे
किसान भाई, इस तरीके से खेती करने के इतने फायदे हैं कि एक बार अपनाने के बाद पुराना तरीका भूल जाएंगे। सबसे बड़ा फायदा पौधों के बीच पर्याप्त जगह और हवा का संचार रहता है, जिससे जड़ें मजबूत होती हैं और गांठें बड़ी-मोटी बनती हैं। घास-फूस बहुत कम उगता है, इसलिए बार-बार निराई-गुड़ाई की जरूरत नहीं पड़ती। रोग और कीटों का खतरा कम हो जाता है, क्योंकि नमी संतुलित रहती है।
सिंचाई का पानी सीधे जड़ों तक पहुंचता है, बर्बादी कम होती है। कुल मिलाकर लागत घटती है, मेहनत बचती है और पैदावार दोगुनी या उससे ज्यादा हो जाती है। फसल की क्वालिटी बेहतर होने से बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं और मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है।
इस विधि से खेती कैसे करें?
तरीका बहुत सरल है। खेत की गहरी जुताई करें, सड़ी गोबर की खाद अच्छी तरह मिलाएं। फिर ट्रैक्टर या बैल से ऊंची मेढ़ें बनाएं मेढ़ की ऊंचाई 1-1.5 फीट और चौड़ाई 2-3 फीट रखें। मेढ़ों के बीच नाली बन जाएगी, जहां पानी बह सकेगा। मेढ़ों पर दो लाइन में पौध या बीज की बुवाई करें। पौधों की दूरी सही रखें ताकि हवा अच्छी चले। संतुलित खाद डालें – नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का बैलेंस। समय पर हल्की सिंचाई करें, ज्यादा पानी न दें। कीट या रोग दिखें तो तुरंत कृषि केंद्र से सलाह लें।
सही बीज चुनें, प्रमाणित और अच्छी किस्में जैसे नासिक रेड, पूसा रेड या लोकल अनुकूलित। फसल की रोज निगरानी करें – घास निकालें, पानी दें और जरूरत पड़ने पर दवा छिड़कें।
लागत, पैदावार और मुनाफा
इस विधि से लागत पारंपरिक से कम आती है क्योंकि निराई-गुड़ाई और दवा का खर्च बचता है। पैदावार कई गुना बढ़ जाती है जहां पुराने तरीके से 200-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलता था, वहां मेढ़ विधि से 400-500 क्विंटल तक संभव है। गांठें मोटी और चमकदार होने से बाजार में प्रीमियम दाम मिलते हैं। कुल मुनाफा दोगुना या उससे ज्यादा हो जाता है।
किसान भाइयों, डॉ. सुशील कुमार जैसे विशेषज्ञों की सलाह है कि वैज्ञानिक तरीके अपनाएं। संतुलित कृषि प्रबंधन से फसल की गुण्णवत्ता सुधरेगी और आपकी मेहनत रंग लाएगी। अगर कोई समस्या हो तो नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या विभाग से संपर्क करें। इस रबी सीजन में रिज विधि ट्राई करें।
