मुंबई—देश की आर्थिक राजधानी—इन दिनों तेज़ राजनीतिक बहस के केंद्र में है। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे शहर की जनसंख्या संरचना में हो रहे बदलाव को लेकर सियासत गरमा गई है। महाविकास आघाड़ी पर आरोप लग रहे हैं कि उसकी नीतियों से मुंबई में एक विशेष वर्ग का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे शहर की पारंपरिक पहचान धीरे-धीरे कमजोर होने का खतरा है। यही कारण है कि मुंबई का भविष्य अब सार्वजनिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका है।
बेहरामपाड़ा, मालवणी और कुर्ला जैसे इलाकों में फैली अनधिकृत बस्तियां इस चर्चा का केंद्र बिंदु बन गई हैं। विपक्ष का दावा है कि झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास के नाम पर इन्हें वैध बनाने की कोशिशें की गईं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह मानवीय और शहरी सुधार की पहल है। इन विरोधाभासी दावों के बीच एक सवाल हर जगह गूंज रहा है—मुंबई की दिशा आखिर तय कौन कर रहा है?
1) अवैध बस्तियों का वैधीकरण: सुधार या रणनीति?
मुंबई के कई हिस्सों में अवैध बस्तियों का तेज़ विस्तार देखा गया है। आलोचकों का कहना है कि MVA शासनकाल में इन्हें नियमित करने की कोशिशें केवल शहरी विकास तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक गणित भी काम कर रहा है।
शहरों का नियोजन जनसंख्या घनत्व और संसाधनों की उपलब्धता से जुड़ा होता है। विरोधियों के मुताबिक, अनधिकृत निर्माणों को वैध ठहराने से किसी खास समुदाय का संगठित वोट बैंक तैयार हो सकता है। उनके अनुसार, यह कदम प्रशासनिक नहीं, बल्कि जनसांख्यिकीय संतुलन को प्रभावित करने वाली दीर्घकालिक रणनीति है—जिसका असर भविष्य के चुनावों पर पड़ सकता है।
2) मराठी अस्मिता बनाम पलायन और घुसपैठ का सवाल
मुंबई में मराठी पहचान लंबे समय से राजनीति का विषय रही है। अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले UBT गुट पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि मराठी आबादी का शहर से धीरे-धीरे विस्थापन हुआ, जबकि वोट बैंक की राजनीति के तहत बाहरी और अवैध प्रवासियों को संरक्षण मिला।
वास्तविकता यह भी है कि बढ़ती महंगाई और रियल एस्टेट कीमतों के कारण मध्यमवर्गीय मराठी परिवार ठाणे, कल्याण, डोंबिवली और विरार जैसे इलाकों की ओर शिफ्ट हुए हैं। इसी बीच, अवैध घुसपैठ को लेकर सुरक्षा चिंताएं भी सामने आई हैं।
आरोप यह है कि यदि राजनीतिक लाभ के लिए अवैध प्रवासियों को पहचान दस्तावेज़ मिलते हैं, तो मामला केवल राजनीति का नहीं रह जाता—यह राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।
3) प्रतीकात्मक फैसले और सत्ता संतुलन
मुंबई के महापौर पद को लेकर भी सियासी चर्चाएं तेज़ हैं। कुछ वर्ग इसे समावेशिता का प्रतीक मानते हैं, जबकि अन्य इसे तुष्टीकरण की राजनीति बताते हैं।
MVA कार्यकाल में याकूब मेमन की कब्र के सौंदर्यीकरण और अज़ान प्रतियोगिताओं जैसे मामलों ने पहले ही विवाद खड़े किए थे। आलोचकों का कहना है कि ऐसे कदम समाज में गलत संदेश देते हैं और कट्टरता को बढ़ावा दे सकते हैं। इसलिए बहस अब पद से ज्यादा नीतियों और मंशा पर केंद्रित है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह एक तरह का दोहरा खेल है—जहां बहुसंख्यक समाज को भाषा, जाति और क्षेत्रीय मुद्दों में उलझाया जाता है, और अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट कर सत्ता संतुलन साधा जाता है।
4) व्यापक राजनीति और इसके असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति केवल मुंबई तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राज्य की राजनीति को प्रभावित कर रही है। एक तरफ आरक्षण और क्षेत्रीय अस्मिताओं से मतदाताओं को विभाजित किया जाता है, तो दूसरी ओर तुष्टीकरण या भय की राजनीति से वोटों का ध्रुवीकरण होता है।
मुंबई की पहचान भले ही महानगरीय हो, लेकिन इसकी जड़ें मराठी संस्कृति और भारतीय मूल्यों में हैं। राजनीतिक लाभ के लिए इस संतुलन से समझौता करना दीर्घकालिक रूप से शहर के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
मुंबई किस राह पर?
Mumbai सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि देश की आर्थिक रीढ़ है। यहां सामाजिक सौहार्द और स्थिरता बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि वोट बैंक की राजनीति के तहत शहर की जनसंख्या संरचना बदली जाती है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
MVA पर लगे आरोप भले ही राजनीतिक हों, लेकिन नागरिकों के लिए सवाल सीधा है—क्या उन्हें विकास-केंद्रित, पारदर्शी शासन चाहिए या ऐसी राजनीति, जो शहर की मूल पहचान को दांव पर लगा दे?
आम लोगों की अपेक्षा यही है कि सत्ता की दौड़ में समाज की बुनियाद से खिलवाड़ न हो। मुंबई की पहचान बचाना हर राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी है—क्योंकि यही पहचान इस महानगर की सबसे बड़ी ताकत है।
Source : https://hindi.oneindia.com/
