नई दिल्ली-बीजिंग रिश्तों में नई शुरुआत?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के तियानजिन शहर पहुंचे, जहां उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के इतर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। यह उनकी सात साल में पहली चीन यात्रा है और इसे दोनों देशों के रिश्तों में नए अध्याय की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखा जा रहा है। खास बात यह है कि मोदी और शी की यह मुलाकात पिछले 10 महीनों में दूसरी उच्चस्तरीय वार्ता है। इससे पहले दोनों नेता 2024 में रूस के कज़ान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में आमने-सामने आए थे।
भारत-चीन संबंध 2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद काफी बिगड़ गए थे, लेकिन अब यह मुलाकात दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करने की दिशा में अहम मानी जा रही है। साथ ही, यह ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका लगातार भारत और चीन पर व्यापारिक दबाव बना रहा है और दोनों को रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर चेतावनी दे चुका है।
मोदी-शी की मुलाकात का संदेश
तियानजिन में बैठक की शुरुआत दोनों नेताओं के हाथ मिलाने से हुई, जिसे दोनों देशों के रिश्तों में सुधार का संकेत माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत-चीन रिश्तों की नींव आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता पर टिकी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि “दोनों देशों के 2.8 अरब लोग सहयोग से लाभान्वित होंगे और इसका असर पूरी मानवता पर पड़ेगा।”
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी प्रधानमंत्री मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि “भारत और चीन दुनिया के सबसे प्राचीन और सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल हैं। दोनों ग्लोबल साउथ के अहम स्तंभ हैं और ऐसे में पड़ोसी और साझेदार बनना बेहद आवश्यक है। ड्रैगन और हाथी का साथ आना पूरी दुनिया के लिए सकारात्मक संदेश है।”
पुराने मतभेद, नए अवसर
प्रधानमंत्री मोदी की पिछली चीन यात्रा 2018 में वुहान में हुई थी, जब डोकलाम विवाद के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर था। उसके बाद 2020 की गलवान झड़प ने रिश्तों को और खराब कर दिया। हालांकि, 2024 में रूस में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद से रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार दिखने लगा।
मोदी और शी की ताजा बातचीत में सीमा विवादों पर हुई प्रगति, कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों की शुरुआत जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। यह वार्ता संकेत देती है कि भारत और चीन फिर से आर्थिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
अमेरिका पर अप्रत्यक्ष संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी-शी की यह मुलाकात सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका को भी अप्रत्यक्ष संदेश देती है। हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और चीन दोनों के साथ व्यापारिक मोर्चे पर आक्रामक रुख अपनाया है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ 50% तक बढ़ा दिए हैं और चीन के साथ भी व्यापार युद्ध छेड़ रखा है।
इस पृष्ठभूमि में भारत और चीन का एक-दूसरे के करीब आना अमेरिकी रणनीति को चुनौती देता है। लंबे समय तक अमेरिका ने भारत को चीन के प्रतिपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया था, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं।
आगे की राह
प्रधानमंत्री मोदी का कार्यक्रम रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात का भी है। यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब भारत अमेरिकी दबाव के बावजूद रूसी तेल की खरीद जारी रखे हुए है।
कुल मिलाकर, मोदी की यह चीन यात्रा केवल एक शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं है, बल्कि एशियाई शक्तियों के बीच नए समीकरण बनाने की दिशा में अहम कदम है। विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों का स्वरूप न सिर्फ एशिया बल्कि वैश्विक राजनीति पर भी गहरा असर डालेगा।