EMI – नौकरी या कारोबार के चलते दूसरे शहर में रहने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि घर खरीदें या किराये पर रहें। एक तरफ होम लोन की लंबी EMI का बोझ होता है, तो दूसरी तरफ हर महीने जाने वाला रेंट। सही फैसला आपकी इनकम, करियर प्लान और फाइनेंशियल गोल पर निर्भर करता है… ऐसे में चलिए आइए नीचे खबर में समझ लेते है इसका पूरा कैलकुलेशन-
देश में लाखों-करोड़ों लोग रोज़गार के लिए अपने शहर से बाहर जाते हैं और समय के साथ परिवार को भी वहीं शिफ्ट कर लेते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि खुद का घर खरीदें या किराये पर रहना बेहतर रहेगा।
घर खरीदने पर कीमतें बहुत ज्यादा हैं और सालों तक होम लोन की EMI चुकानी पड़ती है, जबकि किराये में रहने पर हर महीने पैसा जाता है लेकिन प्रॉपर्टी अपनी नहीं बनती। इसी दुविधा के बीच आज हम समझने की कोशिश करेंगे कि EMI पर घर लेना सही फैसला है या रेंट पर रहना ज्यादा फायदेमंद।
किराये पर रहना: एक समझदारी भरा विकल्प-
मेट्रो शहरों में काम करने वाले युवा प्रोफेशनल्स के लिए किराये पर रहना अक्सर एक व्यावहारिक विकल्प होता है। इससे हर महीने का फिक्स खर्च सीमित रहता है और SIP, इमरजेंसी फंड जैसी बचत के साथ-साथ करियर में जरूरी फ्लेक्सिबिलिटी (flexibility) भी बनी रहती है। खासकर पहली नौकरी करने वालों या कम आय वाले लोगों के लिए यह एक समझदारी भरी शुरुआत मानी जाती है।
EMI Vs रेंट (मेट्रो सिटीज)-
अगर बेंगलुरु या मुंबई (Mumbai) जैसे शहर की बात करें, तो वहां 2BHK फ्लैट की कीमत करीब 1.2 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है। मान लीजिए आप 80% यानी लगभग 96 लाख रुपये का होम लोन (home loan) 20 साल के लिए 8.5% ब्याज पर लेते हैं, तो आपकी मंथली EMI करीब 83,000 रुपये बनेगी। वहीं, यही फ्लैट 38,000 से 45,000 रुपये महीने के किराये पर मिल सकता है। ऐसे में रेंट पर रहने से हर महीने लगभग 40,000 रुपये की बचत हो सकती है, जिसे आप म्यूचुअल फंड (mutual fund), NPS या दूसरी निवेश योजनाओं में लगाकर बेहतर रिटर्न पा सकते हैं।
पहला घर कब खरीदना चाहिए-
जब EMI और किराया लगभग बराबर हो जाए, या लंबे समय तक एक ही जगह रहने की पक्की योजना हो, तब घर खरीदना ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। जिन परिवारों को 10 साल या उससे अधिक समय तक एक ही शहर में रहने की संभावना होती है, उनके लिए EMI एक तरह की “फोर्स्ड सेविंग” बन जाती है। इसके साथ ही, खुद का घर होने से भविष्य में लगातार बढ़ते किराये की चिंता से भी राहत मिलती है।
EMI Vs रेंट (टियर-2 सिटीज)-
इंदौर, कोयंबटूर या जयपुर जैसे शहरों में 2BHK फ्लैट की कीमत करीब 45 लाख रुपये है। अगर आप 36 लाख रुपये का होम लोन लेते हैं, तो मंथली ईएमआई (montlhy EMI) करीब 31,000 रुपये की बनेगी। वहीं, आपको यह फ्लैट 18,000 से 22,000 रुपये प्रति माह किराए में मिल जाएगा। यहां EMI और किराये का अंतर ज्यादा नहीं होता, जिससे पहली बार घर खरीदने वालों के लिए मालिकाना हक (ownership rights) ज्यादा आकर्षक बन जाता है।
फर्स्ट टाइम प्रॉपर्टी में निवेश करने वालों के लिए समझें पूरा गणित-
भारत में प्रॉपर्टी निवेश को लेकर एक आम “थंब रूल” माना जाता है कि किराये से होने वाली आमदनी, EMI का कम से कम 50% होनी चाहिए। यानी अगर आपकी EMI 40,000 रुपये है, तो रेंट कम से कम 20,000 रुपये या उससे ज्यादा होना बेहतर माना जाता है। इससे हर महीने कैश फ्लो पर दबाव कम पड़ता है और प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ने (property price hike) के साथ लंबे समय में अच्छा रिटर्न मिलने की संभावना भी रहती है।
फर्स्ट टाइम बायर्स हिडन कॉस्ट का भी रखें ध्यान-
घर खरीदना सिर्फ EMI तक सीमित नहीं है। इसके साथ और भी कई खर्चे आते हैं। इनमें रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी (5 से 7% फीसदी), मेंटेनेंस (3 से 6 रुये प्रति वर्ग फुट), प्रॉपर्टी टैक्स (property tax) आदि। आप घर खरीद रहे हैं, तो इन खर्चों का जरूर ध्यान रखें।
– घर खरीदने के लिए तैयार नहीं तो REITs है एक अच्छा ऑप्शन
– पहली बार निवेश करने वाले भारतीयों के लिए REITs रियल एस्टेट में निवेश का आसान तरीका हैं।
– यहां आप 10,000 से 15,000 रुपये में एंट्री ले सकते हैं।
– यहां आपको 6 से 8% तक का मुनाफा मिलता है।
– यहां न लोन की झंझट है, न किरायेदार की टेंशन है।
– फिजिकल प्रॉपर्टी (physical property) खरीदने से पहले यह एक स्मार्ट कदम हो सकता है।
निष्कर्ष-
– अगर EMI, किराये से दोगुनी या उससे ज्यादा है, इनकम (income) को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है या नौकरी के चलते शहर बदलने की संभावना है, तो ऐसे हालात में किराये पर रहना ज्यादा समझदारी भरा फैसला होता है।
– अगर आपकी इनकम स्थिर है और EMI बिना दबाव के आराम से चुकाई जा सकती है, लोन की अवधि लंबी है और उसी शहर में आपके करियर की ग्रोथ (growth) के अच्छे मौके हैं, तो ऐसे में घर खरीदना एक बेहतर और सुरक्षित फैसला माना जा सकता है।
