अप्रैल 2027 से लागू CAFE-3 मानक कार डिजाइन, माइलेज और कीमतों को बदल देंगे। कंपनियों को फ्लीट का औसत CO2 91.7g/km से घटाकर 78.9g/km करना होगा। प्रदूषण रोकने के लिए EV-हाइब्रिड को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन छोटी कारें महंगी होंगी।
देश में कार खरीदने और बनाने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव आने वाला है। सरकार और ऑटो इंडस्ट्री के बीच लंबी चर्चाओं के बाद CAFE-3 (कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी) नियमों पर सहमति बन चुकी है। ये नए मानक 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे, जिससे वाहन कंपनियों को अपनी पूरी फ्लीट का औसत CO2 उत्सर्जन और फ्यूल खपत को काफी सख्त लक्ष्यों तक लाना होगा।
भारी उद्योग मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव हनीफ कुरैशी ने स्पष्ट किया है कि समयसीमा बढ़ाने की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी, क्योंकि हितधारकों से लगातार फीडबैक लिया गया है। जल्द ही नया नोटिफिकेशन जारी होने की उम्मीद है।
प्रदूषण पर लगाम लगाने की चुनौती
देश में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है, खासकर दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाकों में जहां वाहनों का योगदान 40 प्रतिशत से ज्यादा है। CAFE-3 इन्हीं चुनौतियों का जवाब है। पहले चरण (CAFE-1) में CO2 उत्सर्जन 130 g/km था, CAFE-2 में इसे 113 g/km किया गया। अब CAFE-3 के तहत FY27 में 91.7 g/km से शुरू होकर FY32 तक 78.9 g/km तक लाना होगा। फ्यूल खपत 100 किमी में 3.72 लीटर से घटाकर 3.01 लीटर करने का लक्ष्य है।
आसान शब्दों में, अब हर कार अलग से नहीं, बल्कि कंपनी की कुल बिक्री का औसत प्रदूषण मापा जाएगा। अगर औसत लक्ष्य से ऊपर गया, तो भारी जुर्माना लगेगा- FY28 में प्रति gCO2/km 2,500 रुपये से बढ़कर FY32 में 4,500 रुपये।
डिजाइन और प्लानिंग में आएंगे बड़े बदलाव
पहले नियम वाहन के साइज पर आधारित थे, लेकिन CAFE-3 पूरी फ्लीट पर फोकस करेगा। छोटी कारों (<909 किग्रा) के लिए 3g CO2/km की पुरानी छूट हटा दी गई है, हालांकि संशोधित कर्व से थोड़ी राहत मिलेगी। कंपनियों को हल्के मटेरियल जैसे एल्यूमिनियम, कार्बन फाइबर इस्तेमाल करने, एयरोडायनामिक्स सुधारने और रीजेनरेटिव ब्रेकिंग जोड़ने पड़ेंगे।
मोटरसाइकिल से कार में शिफ्ट करने वाले मिडिल क्लास खरीदारों पर असर पड़ेगा, क्योंकि एंट्री-लेवल हैचबैक महंगी हो जाएंगी। मारुति सुजुकी जैसी कंपनियां, जो 80 प्रतिशत छोटी कारें बेचती हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी। वे हाइब्रिड मॉडल बढ़ाएंगी, जबकि टाटा-महिंद्रा जैसी SUV फोकस वाली कंपनियों को फायदा।
इंजन, फ्यूल और टेक्नोलॉजी पर जोर
सरकार E25 फ्यूल (25% इथेनॉल ब्लेंड) की तैयारी करा रही है, और आगे 20% से ज्यादा ब्लेंडिंग की योजना है। फ्लेक्स-फ्यूल इंजन मुख्यधारा बनेंगे, जो पेट्रोल-इथेनॉल दोनों पर चल सकेंगे। हाइब्रिड और EV को सुपर क्रेडिट्स मिलेंगे- 9g/km से घटाकर 6g/km का कैप, लेकिन रेंज एक्सटेंडेड EV (REEV) को भी EV जैसा लाभ। क्रेडिट ट्रेडिंग सिस्टम से एक कंपनी अतिरिक्त क्रेडिट बेचकर दूसरी की मदद कर सकेगी। डीजल इंजन खत्म नहीं होंगे, लेकिन उनकी संख्या घंटेगी क्योंकि हाइब्रिड सस्ते पड़ेंगे। फ्यूल सेविंग टेक जैसे टर्बोचार्जर, VVT और सिलेंडर डिएक्टिवेशन आम होंगे।
कीमतें बढ़ेंगी, लेकिन लंबा फायदा
नई तकनीक से लागत 5-10% बढ़ेगी, यानी 5 लाख की कार 5.25-5.5 लाख हो सकती है। छोटी पेट्रोल कारें सबसे महंगी होंगी, जबकि EV-हाइब्रिड सस्ते। लॉन्ग टर्म में बेहतर माइलेज (20-25% ज्यादा) से फ्यूल बिल कम होगा। इंडस्ट्री ने 5 साल के अंत में क्रेडिट चेक की मांग की, जिसे मान लिया गया।
ग्रीन मोबिलिटी की ओर कदम
CAFE-3 से ऑटो सेक्टर ग्रीन मोबिलिटी की ओर तेजी से बढ़ेगा। प्रदूषण कम होगा, EV-हाइब्रिड का बाजार फलेगा-फूलेगा। लेकिन शॉर्ट टर्म में उपभोक्ताओं को महंगे दाम चुकाने पड़ेंगे। सरकार का मकसद पेनल्टी नहीं, बल्कि क्लीन टेक को प्रेरित करना है। क्या ये बदलाव मिडिल क्लास की कार सपनों को साकार करेंगे या चुनौती देंगे? आने वाले साल जवाब देंगे।
