अमेरिका और भारत के बीच बढ़ते टैरिफ विवाद ने अब अमेरिकी राजनीति में भी भूचाल ला दिया है। अमेरिकी फॉरेन पॉलिसी को आकार देने वाली हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी ने अपने ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों पर सीधा हमला बोला है। समिति ने कहा है कि भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाना न केवल अमेरिका-भारत संबंधों को कमजोर कर रहा है बल्कि इससे खुद अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों को भी नुकसान झेलना पड़ रहा है।
समिति ने उठाए गंभीर सवाल
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी, जो अमेरिकी संसद की एक स्थायी समिति है और विदेश नीति संबंधी कानून व जांच की देखरेख करती है, ने ट्रंप प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा कि भारत को निशाना बनाना किसी भी लिहाज से संतुलित नीति नहीं है।
समिति का कहना है कि यदि ट्रंप सचमुच रूस से तेल खरीदने पर रोक लगाना चाहते तो उन्हें चीन सहित सभी देशों पर प्रतिबंध लागू करने चाहिए थे। लेकिन इसके बजाय उन्होंने केवल भारत को टारगेट किया, जबकि चीन आज भी रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है और उस पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई।
“यूक्रेन तो सिर्फ बहाना”
समिति ने यह भी कहा कि ऐसा लगता है कि यह पूरा टैरिफ विवाद यूक्रेन युद्ध के बहाने चलाया जा रहा है। दरअसल, भारत पर दबाव डालकर ट्रंप प्रशासन एकतरफा संदेश देना चाहता है, लेकिन इसका नतीजा यह है कि अमेरिका की अपनी ही विश्वसनीयता दांव पर लग रही है।
रिपब्लिकन बहुमत वाली समिति की आलोचना
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी में फिलहाल 52 सदस्य हैं, जिनमें 27 रिपब्लिकन और 25 डेमोक्रेट शामिल हैं। समिति के चेयरमैन रिपब्लिकन पार्टी से हैं और अल्पमत में डेमोक्रेट ग्रेगरी मीक्स हैं। इसके बावजूद समिति के कई सदस्यों ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति की कड़ी आलोचना की।
विशेषज्ञों का मानना है कि रिपब्लिकन बहुमत वाली समिति का ट्रंप के खिलाफ इस तरह खड़ा होना बेहद अहम है और यह दिखाता है कि उनकी नीतियों को लेकर असहमति बढ़ रही है।
27 अगस्त से लागू हुआ 50% टैरिफ
गौरतलब है कि भारत पर ट्रंप का 50 प्रतिशत टैरिफ 27 अगस्त से लागू हो चुका है। इसमें से 25 प्रतिशत टैरिफ रूस से तेल आयात को लेकर लगाया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने के चलते मास्को को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में मदद मिल रही है।
भारत का पलटवार
भारत ने अमेरिकी आरोपों को खारिज करते हुए साफ कहा है कि ऊर्जा सुरक्षा उसका संप्रभु अधिकार है और जब यूरोप, चीन और यहां तक कि अमेरिका खुद रूस से कारोबार जारी रख सकते हैं, तो भारत को रोकने का कोई औचित्य नहीं है। भारत ने यह भी संकेत दिया है कि वह अमेरिकी दबाव में नहीं झुकेगा और अपने ऊर्जा आयात के फैसले राष्ट्रीय हित को देखते हुए करेगा।
विशेषज्ञों की राय
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में न सिर्फ व्यापारिक रिश्तों बल्कि रणनीतिक साझेदारी पर भी असर डाल सकता है। हालांकि, भारत की ओर से निर्यात विविधीकरण और नए साझेदार देशों की ओर रुख करने की रणनीति इस टैरिफ के असर को काफी हद तक कम कर सकती है।