पिछले कुछ महीनों में भारतीय शेयर बाजार लगातार नई ऊँचाइयों को छू रहा था। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ने रिकॉर्ड स्तर हासिल किए और निवेशकों का भरोसा भी चरम पर था। घरेलू और विदेशी निवेशकों ने जमकर खरीदारी की, जिससे बाजार में तेजी बनी रही। लेकिन अब अचानक इस रफ्तार पर ब्रेक लग गया और इंडेक्स गिरावट की ओर बढ़ गए। सवाल उठता है – आखिर इस तेजी पर अचानक लगाम क्यों लगी? आइए समझते हैं इसके पाँच मुख्य कारण।
1. वैश्विक बाजारों से नकारात्मक संकेत
भारतीय शेयर बाजार की चाल अंतरराष्ट्रीय रुझानों से काफी हद तक जुड़ी होती है। हाल ही में अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं में मंदी की आशंका बढ़ी है। इसके अलावा, फेडरल रिज़र्व की सख्त नीतियाँ और चीन की आर्थिक सुस्ती ने वैश्विक निवेशकों का भरोसा कमजोर किया। नतीजा यह हुआ कि ग्लोबल अनिश्चितता का सीधा असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा।
2. विदेशी निवेशकों की मुनाफावसूली
भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी निवेशकों (FII/FPI) की भूमिका बेहद अहम है। हाल के दिनों में डॉलर की मजबूती और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल के कारण विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में मुनाफावसूली शुरू कर दी। बेहतर रिटर्न की तलाश में वे अपना पैसा अन्य बाजारों में ले गए, जिससे घरेलू बाजार पर दबाव आ गया।
3. कच्चे तेल की महंगाई
भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। महंगा तेल सीधे कंपनियों की लागत और देश की महंगाई पर असर डालता है। इस वजह से निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिसका असर शेयर बाजार की धार पर पड़ा।
4. कंपनियों के कमजोर तिमाही नतीजे
हालाँकि कुछ बड़ी कंपनियों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन आईटी, FMCG और मेटल सेक्टर जैसे क्षेत्रों के रिज़ल्ट्स ने निराश किया। कई कंपनियों की ग्रोथ सुस्त रही और उनकी आगे की गाइडेंस भी मजबूत नहीं दिखी। इससे निवेशकों का जोश थोड़ा ठंडा पड़ गया।
5. भू-राजनीतिक तनाव और घरेलू चुनौतियाँ
रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-ताइवान विवाद और पश्चिम एशिया की अस्थिरता जैसी भू-राजनीतिक चुनौतियाँ अब भी बरकरार हैं। ये कारक वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा कीमतों को प्रभावित करते हैं। इसके साथ ही, भारत में महंगाई का दबाव, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और चुनावी माहौल ने निवेशकों को और ज्यादा सतर्क कर दिया है।
आगे की तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट किसी संकट का संकेत नहीं, बल्कि लंबे समय की तेजी के बाद आया एक “नेचुरल करेक्शन” है। यह बाजार को संतुलित करता है और आगे की मजबूती की नींव रखता है। अगर आने वाले महीनों में महंगाई पर काबू पाया जाता है, विदेशी निवेशकों की वापसी होती है और कंपनियों के नतीजे सुधरते हैं, तो शेयर बाजार फिर से रफ्तार पकड़ सकता है।
👉 निष्कर्ष:
बाजार की तेजी थमने के पीछे घरेलू और वैश्विक दोनों स्तरों पर कई वजहें हैं। निवेशकों के लिए ऐसे समय में घबराने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति अपनाना समझदारी होगी। करेक्शन बाजार की स्वाभाविक प्रक्रिया है, और होशियार निवेशक इसे नए अवसर के रूप में देखते हैं।
