यज्ञ के लिए राजा दक्ष ने क्यों नहीं बुलाया भगवान शिव और बेटी सती को ,जानिए इस दिलचस्प कहानी से

 
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वन में सीता की खोज में परेशान प्रभु श्री राम की सती जी द्वारा परीक्षा लेने से व्यथित शिव जी ने मन ही मन उनका परित्याग कर दिया और कैलाश पर्वत पर पहुंच कर अखंड समाधि में लीन हो गए सती जी भी दुखी मन से कैलाश में ही रहने लगी उन्होंने दुखी भाव से प्रभु श्री राम को याद कर विनती की कि आप तो सबका दुःख दूर करने वाले हो और में यह इस हालत में यह चाहती हूँ कि मेरी देह जल्द से जल्द छूट जाएं करीब 87 हजार साल बीत जाने पर शिव जी ने श्री राम का नाम लेते हुए समाधि खोली तो सती ने जाना कि जगत के स्वामी जाग गए है उन्होंने आगे बढ़ कर प्रणाम किया तो शिवजी ने बैठने के लिए आसन दिया शिव जी श्री हरी कि कथाएं सुनाने लगे इसी समय में दक्ष राजा हुए और ब्रह्मा जी ने उनको सब तरह योग्य मानकर प्रजापतियों का नायक बना दिया 

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तुलसीदास जी ने लिखा है कि संसार में ऐसा कोई नहीं है जो प्रभुता पाकर अभिमानी न हो जाए इतना बड़ा अधिकार पाकर दक्ष को घमंड हो गया दक्ष ने सभी मुनियों को बुलकर बड़ा सा  यज्ञ करने कि योजना बनाई जिस्मने सभी देवताओं का आदर सहित बुलाया गया दक्ष का निमंत्रण पाकर ब्रह्मा जी विष्णु जी महादेव को छोड़कर किन्नर नाग सिद्ध गंधर्व और सभी देवी देवता अपनी अपनी पत्नियों के साथ  यज्ञ में भाग लेने के लिए अपने विमानों को सजा कर रवाना हो गए सती जी ने देखा कि आकाश मार्ग से अनेकों प्रकार के सुंदर विमान चले जा रहे है और सुंदरियां मधुर गीत गा रही है जिनके सुनने से मुनियों का ध्यान भंग हो जाता है 

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सती जी ने आकाश मार्ग से देवताओं को विमानों से जाते देखा तो महादेव से उनके जाने का कारण पूछा महादेव ने ध्यान कर दक्ष प्रजापति द्वारा  यज्ञ करने कि बात बताई पिता द्वारा  यज्ञ कि बात सुनकर सती जी खुश हुई और सोचने लगी कि यदि महादेव जी आज्ञा दे तो कुछ दिन पिता के घर जाकर रहकर आऊं उनके मन में पिता द्वारा त्याग देने का बहुत दुःख था इसलिए पति से अनुमति लेने में संकोच हो रहा था फिर संकोच भय और प्रेम में सराबोर होकर उन्होंने मधुर वाणी से कहा है प्रभो मेरे पिता के घर में बहुत बड़ा उत्सव है अगर अपनी अनुमति हो तो मैं भी आदर सहित उसे देखने के लिए जाऊं