देश में किसानो के लिए बेबी कॉर्न की खेती मुनाफे की होती है।इससे भारत के कई राज्यों में बेबी कॉर्न की खेती की जाती है।बेबी कॉर्न की उत्पति दक्षिण पूर्व एशिया में हुई थी।इन क्षेत्रो में सदियों से इसकी खेती की जा रही है और धीरे धीरे दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ी है।
बेबी कॉर्न एक अपरिपक अवस्था में कटा जाने वाला अनाज है।जब मकई छोटे और कोमल होते है।यह मीठे मकई का एक लुथ संस्करण है ,जिसे गुठली के परिपक होने और सख्त होने से बहुत पहले काटा जाता है।बेबी कॉर्न को इसके छोटे आकर,नाजुक बनावट और हल्के सबद की विशेषता से इसे दुनिया भर के अलग पाक व्यंजनों में एक लोकप्रिय घटक बनाता है।यह एशियाई व्यंजनों में संसकृति महत्व रखता है। इसका इस्तेमाल सीटर फ्राइज,सलाद,सुप में किया किया जाता है।
बुवाई का समय
बेबी मकई जायद के मौसम के दौरान बोई जाती है,जो मार्च अप्रेल से शुरू होता है और क्षेत्र और जलवायु के आधार पर जून जुलाई तक रहता है।बुवाई अक्सर अंतिम ठंड की तारीख के बाद की जाती है और जब मिट्टी का तापमान अंकुरण के लिए पर्याप्त गर्म होता है।बेबी कॉर्न गर्म तापमान में पनपता है और इसके लिए भरपूर धुप की आवश्यकता होती है।गर्मी का मौसम गर्म होता है,जो बेबी कॉर्न के पोधो के विकास के लिए आदर्श है।
फसल की अवधि
बेबी मकई के लिए बुवाई से कटाई तक की अवधि अपेक्षाकृत कम होती है।यह 60 से 70 दिनों के आसपास यह जायद मौसम की समय सिमा के भीतर खेती के लिए उपयुक्त है।
सिचाई
बेबी मकई की खेती के लिए जायद मौसम के दौरान जब तापमान ज्यादा होता है और वशीकरण दर ज्यादा होती है।किसानो को यह सुनिक्षित करने की आवश्यकता है की फसल को इसकी वृद्धि और विकास के लिए पर्याप्त पानी मिले।
कटाई
बेबी कॉर्न को टन काटा जाता है,जब वे अभी भी अपरिपक होते है।पर रेशम के उदवव के लगभग 2-3 दिन बाद जायद मौसम के दौरान कटाई यह सुनिक्षित करती है की मानसून के मौसम की शुरुआत से पहले फसल की कटाई हो जाए,जो अन्यथा गुणवत्ता के मुङो और फसल को नुकसान पंहुचा सकती है।
