Gold Silver New Record – सोना और चांदी ने हाल ही में ऐतिहासिक तेजी दर्ज की है। कीमती धातुओं की कीमतें नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। बाजार में यह रुझान लगातार देखने को मिल रहा है, जिससे ग्लोबल (global) और घरेलू निवेशकों की नजरें सोने और चांदी पर टिक गई हैं… ऐसे में चलिए आइए नीचे खबर में जान लेते है कि इतनी तेजी के पीछे कारण क्या हैं-
ग्लोबल मार्केट में सोना और चांदी दोनों ने नया रिकॉर्ड स्तर छू लिया। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और नीतिगत अनिश्चितता के चलते निवेशकों ने सुरक्षित निवेश की ओर रुख किया, जिससे कीमती धातुओं में तेज उछाल देखने को मिला।
सोने की कीमत (gold price) 1.5% से अधिक उछलकर $5,000 प्रति औंस के ऊपर निकल गई। वहीं, चांदी ने भी जबरदस्त छलांग (silver price hike) लगाते हुए $110.88 प्रति औंस का नया ऑल-टाइम हाई छू लिया। चांदी में एक दिन में 6% से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई।
क्यों रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा सोना? जानिए बड़ी वजहें-
सोने में आई यह तेजी कई बड़े कारणों का नतीजा है। यूक्रेन और गाजा में जारी संघर्ष, वेनेजुएला पर अमेरिका की नई कार्रवाई और दुनिया भर में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को कमजोर कर रहा है। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) की ट्रेड पॉलिसी से भी बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। कनाडा पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी जैसे बयानों ने ग्लोबल ट्रेड को लेकर चिंता और गहरा दी है।
मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स से भी मिला सपोर्ट-
भू-राजनीतिक तनाव के साथ-साथ बड़े मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स (macro economic factors) भी सोने और चांदी को सपोर्ट कर रहे हैं। महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी हुई है, अमेरिकी डॉलर में कमजोरी आई है और सेंट्रल बैंक लगातार सोने की खरीदारी कर रहे हैं। इसके अलावा, इस साल अमेरिकी फेड से ब्याज दरों में कटौती (US Fed cuts interest rates) की उम्मीद भी कीमती धातुओं को मजबूत सहारा दे रही है।
इन हालात में जब शेयर और बॉन्ड जैसे पारंपरिक एसेट्स भरोसेमंद नहीं लगते, तब निवेशक सुरक्षित विकल्प तलाशते हैं। सोना और चांदी की वैल्यू (silver value) ऐसे समय में बेहतर तरीके से बनी रहती है। इसी वजह से इन्हें सुरक्षित निवेश माना जाता है।
गोल्ड बना ‘जियोपॉलिटिकल इंश्योरेंस’-
आनंद राठी के मुताबिक, सोना और चांदी में आई मौजूदा तेजी कोई शॉर्ट टर्म मूव नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल इकोनॉमिक सिस्टम में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत है। अब आर्थिक फैसले सिर्फ एफिशिएंसी के आधार पर नहीं हो रहे, बल्कि उनमें पावर पॉलिटिक्स की भूमिका बढ़ गई है। ट्रेड सैंक्शन, टेक्नोलॉजी (technology) पर पाबंदियां और एनर्जी सिक्योरिटी (energy security) जैसे मुद्दे अब ग्लोबल कैपिटल फ्लो को प्रभावित कर रहे हैं।
आनंद राठी के अनुसार, सोना अब सिर्फ महंगाई से बचाव का साधन नहीं रहा, बल्कि अनिश्चित और अस्थिर वैश्विक माहौल में यह ‘जियोपॉलिटिकल इंश्योरेंस’ (Geopolitical Insurance) बन गया है। बढ़ते फिस्कल डेफिसिट और सेंट्रल बैंकों की आक्रामक बैलेंस शीट एक्सपैंशन से फिएट करेंसी पर भरोसा कमजोर हुआ है, जिससे सोने की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
सेंट्रल बैंकों की खरीदारी ने बढ़ाया गोल्ड पर भरोसा-
2010 के बाद से सेंट्रल बैंकों (central banks) की सोने की खरीद लगातार मजबूत बनी हुई है। 2018 के बाद इसमें और तेजी आई, जबकि 2022 के बाद यह ट्रेंड और ज्यादा मजबूत हो गया। अब रिजर्व मैनेजर्स डॉलर और यूरो पर निर्भरता घटाकर अपने रिजर्व को ज्यादा सुरक्षित और डायवर्सिफाइड (diversified) बनाना चाहते हैं। इसकी बड़ी वजह करेंसी कंसन्ट्रेशन (currency concentration) और रिजर्व को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने का डर है।
सोने की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कोई काउंटरपार्टी रिस्क नहीं होता और यह किसी एक देश या पेमेंट सिस्टम के नियंत्रण में नहीं रहता। इसी कारण सेंट्रल बैंकों का भरोसा सोने पर लगातार बढ़ रहा है।
मार्केट गिरने पर कैसे मदद करता है सोना-
लॉन्ग टर्म आंकड़े बताते हैं कि जब शेयर बाजार (share market) में तेज गिरावट आती है, तब सोने का इक्विटी से को-रिलेशन कम या नेगेटिव हो जाता है। भले ही लंबे समय में इक्विटी बेहतर रिटर्न देती हो, लेकिन अस्थिर दौर में सोना पोर्टफोलियो को बैलेंस रखने में मदद करता है। इसी वजह से सोने को ट्रेडिंग (gold trading) से ज्यादा एक स्ट्रैटेजिक एसेट एलोकेशन (Strategic Asset Allocation) माना जाता है।
गोल्छ से अलग है सिल्वर की कहानी-
आनंद राठी के अनुसार, चांदी को सोने की तरह शुद्ध सेफ-हेवन एसेट नहीं माना जा सकता। चांदी एक हाइब्रिड एसेट है, जो आंशिक रूप से मौद्रिक धातु और आंशिक रूप से इंडस्ट्रियल कमोडिटी (Industrial commodity) की तरह काम करती है। इसी वजह से इसमें उतार-चढ़ाव ज्यादा रहता है और इसकी कीमतें सीधे तौर पर इकोनॉमिक साइकिल से जुड़ी होती हैं।
दुनिया की लगभग 60% चांदी कॉपर, जिंक और लेड जैसी बेस मेटल माइनिंग (Base Metal Mining) के दौरान बाय-प्रोडक्ट के रूप में निकलती है। इसलिए चांदी की सप्लाई (silver supply) ज्यादा लचीली नहीं होती। जब इकोनॉमी में तेजी या मंदी का दौर आता है, तो इसी वजह से चांदी की कीमतों में तेज और अचानक उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है।
चांदी की चाल आगे किस पर निर्भर करेगी-
हालिया तेजी गिरती रियल ब्याज दरों और रिफ्लेशन की उम्मीदों का नतीजा है। यह सोने के मुकाबले लंबे समय से कमजोर प्रदर्शन के बाद आई कैच-अप रैली (I Catch-Up Rally) भी है। ब्रोकरेज का मानना है कि यह कैच-अप फेज अब काफी हद तक पूरा हो चुका है।
आगे चांदी की कीमतों की दिशा इंडस्ट्रियल डिमांड (Industrial demand) तय करेगी, जिसमें सोलर पावर, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और इलेक्ट्रिफिकेशन सेक्टर (electrification sector) प्रमुख ड्राइवर होंगे।
इतिहास से पता चलता है कि चांदी रिस्क-ऑन माहौल में बेहतर प्रदर्शन करती है, जबकि बाजार में तनाव बढ़ने पर इसकी कीमत कमजोर पड़ जाती है। इस वजह से चांदी को डिफेंसिव हेज (Silver as a defensive hedge) नहीं माना जाता, बल्कि इसे टैक्टिकल या सैटेलाइट इनवेस्टमेंट (satellite investment) के रूप में देखा जाता है।
