Silver Price : बीते कुछ समय में चांदी की कीमतों में खूब तेजी देखी गई है और अब चांदी ऑल टाइम हाई लेवल पर पहुंच गई है। अब ऐसे में कई लोग यहीं सोच रहे हैं कि क्या इतनी उच्च दरों पर चांदी में निवेश करना सही है। चांदी की कीमतों को लेकर उनके मन में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में आइए खबर में जानते हैं कि चांदी में निवेश को लेकर एक्सपर्ट (Silver Explainer) क्या कह रहे हैं।
चांदी की कीमतों में हर दिन तेजी देखने को मिल रही है। इस बार तो 3 लाख प्रति किलो के ऊपर जाकर चांदी की कीमतों ने इतिहास रच दिया है। हफ्ते भर में ही चांदी की कीमतों में हजारों की तेजी देखी जा रही है। अब ऐसे में लोग यही सोच रहे हैं कि आखिर इतनी उच्ची दरों पर चांदी में निवेश (Silver Investment) करना क्या सही है। आइए खबर में इस बारे में एक्सपर्ट की राय जानते हैं।
बीते साल चांदी में आई इतनी तेजी
आंकड़ें देखें तो बीते एक साल में चांदी की कीमतों (silver prices) में लगभग 188 प्रतिशत की तेजी आई है। अब इस बढ़ती तेजी के बाद ICICI प्रूडेंशियल एएमसी (ICICI Prudential AMC) में प्रिंसिपल इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी चिंतन हरिया के अनुसार चांदी में लॉन्गटर्म इन्सेस्टमेंट का आधार दो प्रमुख कारणों पर है। इन कारणों में पहला, मैक्रो आर्थिक अनिश्चितता के दौर में यह एक हेज के रूप में वर्क करती है और दूसरा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट विकास से सीधा जुड़ाव कारण है। उन्होंने अलर्ट किया है कि हाल ही में आए तेज उछाल के चलते निकट अवधि में उठक-पटक का रिस्क बढ़ा है।
सिल्वर इन्वेस्टर्स को दी गई ये सलाह
जानकार का कहना है कि अभी वर्तमान स्तरों पर लंपसम इन्वेस्टमेंट करते समय थोड़ी सावधानी बरतनी जरूरी है, क्योंकि तेज रैलियों के बाद करेक्शन या गिरावट आने की संभावना है। इस दौरान निवेशकों को सलाह दी गई है। जिन इन्वेस्टर्स का सिल्वर में एक्सपोजर (exposure to silver) नहीं है, वो पोजिशन बनाने के लिए स्टैगर्ड इन्वेस्टमेंट(Staggered Investment) का सहारा ले सकते हैं और चांदी में निवेश पहले के इन्वेस्टर्स अपने एसेट एलोकेशन फ्रेमवर्क के अनुरूप बने रह सकते हैं।
क्या आगे गिरेंगे चांदी के भाव
उनका कहना है कि जब किसी एसेट की कीमत (asset price) में इजाफा होता है तो रीबैलेंसिंग (rebalancing Kya Hai)सबसे व्यावहारिक स्ट्रेटजी होती है। अगर पोर्टफोलियो में चांदी का वेट तय सीमा से ऊपर पहुंच गया तो आंशिक मुनाफावसूली कर जोखिम संतुलित हो सकता है। उनका कहना है कि चांदी की कीमतें अभी भी कई कारणों के चलते संवेदनशील हैं। इन कारणों में वैश्विक ब्याज दरों, अमेरिकी डॉलर और रिस्क सेंटिमेंट शामिल है। इस वजह से लॉन्ग टर्म का आउटलुक पॉजिटिव रहने के बाद गिरावट आने की संभावना है। जानकारी के लिए बता दें कि रीबैलेंसिंग जोखिम प्रबंधन का एक बेहतरीन तरीका है।
सिल्वर ETF में बढ़ सकती है इन्वेस्टमेंट
हरिया का कहना है कि तेज रैली के चलते FOMO (Fear of Missing Out) आधारित इन्वेस्टमेंट जैसे कि सिल्वर ETF में इजाफा हो सकता है। ऐसे लेट-साइकिल इन्वेस्टमेंट ज्यादा हो जाता है तो शॉर्ट टर्म करेक्शन बढ़ सकता है। बता दें कि निकट अवधि में सिल्वर ETF (Silver ETF) में उठक-पटक वैश्विक लिक्विडिटी, अमेरिकी ब्याज दरों की संभावना और करेंसी मूवमेंट से जुड़े रहने की संभावना है। लॉन्ग टाइम में चांदी का औद्योगिक यूज और हेज की भूमिका इसे पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा बनाती है।
मांग का आउटलुक और निवेश के बेहतर विकल्प
उनकान कहना है कि चांदी (silver uses ) का उपयोग समय के साथ ही काफी बढ़ गया है ओर सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रिफिकेशन, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य इन्डस्ट्रियल यूज के चलते चांदी की मांग मजबूत बनी रहने की संभावना है। हालांकि, वैश्विक ग्रोथ धीमी पड़ने पर चांदी की कीमतों में एक बार फिर अस्थिरता आ सकती है।
हालांकि अधिकांश इन्वेस्टर्स के लिए सिल्वर ETF जैसे कई रेगुलेटेड इंस्ट्रूमेंट्स (Regulated Instruments) को बेहतर ऑप्शन बताया गया है। जहां एक ओर SIP से इन्वेस्टमेंट करने पर टाइमिंग रिस्क कम हो सकता है। वहीं, लंपसम इन्वेस्टमेंट करेक्शन के दौरान पर अधिक यूज होता है या फिर जब रीबैलेंसिंग की जरूरत पड़ती है तो ये अधिक उपयुक्त होता है।
उनका यह भी कहना है कि सोने-चांदी को मिलाकर कुल एक्सपोजर पोर्टफोलियो (Gold-Silver Exposure Portfolio) 10–15 प्रतिशत तक सीमित रहना चाहिए और इन्वेस्टमेंट फैसले एसेट एलोकेशन अनुशासन के बेस पर लेना चाहिए कि चांदी में निवेश करना सही है या नहीं ।
