Success Story : उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक किसान ने अपनी सोच और मेहनत से खेती का नजरिया बदल दिया है। पारंपरिक तरीकों से हटकर जैविक खेती अपनाकर इस किसान ने कम लागत में शानदार मुनाफा कमाया है। महज 50 हजार रुपये खर्च कर लाखों की आमदनी ने अन्य किसानों के लिए भी नई राह खोल दी है-
इस किसान का तरीका बाकी किसानों से बिल्कुल अलग है। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले का यह किसान इन दिनों चर्चा में है। विकासखंड झंझरी के ग्राम सभा केशवपुर पहाड़वा (Village council Keshavpur Paharwa of development block Jhanjari) में रहने वाले किसान प्रिंस सिंह रसायन-मुक्त यानी जैविक तरीके से गन्ने की खेती कर रहे हैं।
इस पद्धति में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं होता, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर रहती है और खेती की लागत भी कम आती है।
प्रिंस गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और जैविक दवाओं के सहारे गन्ने की खेती कर रहे हैं। बाजार में जैविक गन्ने की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं। रसायन-मुक्त गन्ने की खेती से गोंडा के प्रिंस सिंह की आमदनी लाखों रुपये तक पहुंच गई है। यह खेती न सिर्फ किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत और पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है।
मीडिया से बातचीत में प्रगतिशील किसान प्रिंस सिंह बताते हैं कि उन्होंने ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की, लेकिन कुछ कारणों से उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी। इसके बाद उन्होंने खेती-किसानी में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। फिलहाल वह करीब 10 बीघा भूमि में गन्ने की खेती (Sugarcane cultivation in 10 bigha land) कर रहे हैं।
कहां से मिला आइडिया-
प्रिंस बताते हैं कि उनके पिता भी गन्ने की खेती करते थे, लेकिन वह पारंपरिक तरीके से गन्ना उगाते थे। उन्होंने खेती की शुरुआत तकनीकी पद्धति से की और इस बार पूरी तरह जैविक तरीके से गन्ने की खेती की है। इस दौरान किसी भी प्रकार के रसायन का उपयोग नहीं किया गया। गन्ने की खेती का विचार उन्हें पिता से ही मिला। प्रिंस सिंह बताते हैं कि गांव के पास ही शैलेंद्र सिंह का वर्मी कंपोस्ट प्लांट है, जहां से वे वर्मी कंपोस्ट (vermi compost) लेते हैं। जैविक खेती की प्रेरणा भी उन्हें उन्हीं से मिली है।
कैसे हुई शुरुआत-
प्रिंस बताते हैं कि उन्होंने जैविक खेती की शुरुआत छोटे स्तर से की। सबसे पहले घुइयां (अरबी) की फसल में करीब 5 किलो वर्मी कंपोस्ट का उपयोग किया, जिसका परिणाम काफी बेहतर रहा। इसके बाद उन्होंने जैविक तरीके से धान की खेती (paddy cultivation) की और उसमें भी अच्छा उत्पादन मिला। इन सफल प्रयोगों के बाद उन्होंने अपने पिता से सुझाव दिया कि इस बार गन्ने की खेती भी जैविक पद्धति से की जाए।
प्रिंस सिंह बताते हैं कि वह बुवाई के करीब 9 महीने बाद ही गन्ने की कटाई कर रहे हैं, जबकि आमतौर पर गन्ने की फसल (sugarcane crop) 11 से 12 महीने में तैयार होती है। जैविक तरीके (biological methods) अपनाने से उन्होंने गन्ने को कम समय में तैयार कर लिया। उन्होंने 14201 और 16201 किस्म का गन्ना लगाया है। करीब 2 एकड़ भूमि में खेती पर 40 से 50 हजार रुपये की लागत आई है, जबकि इससे तीन से साढ़े तीन लाख रुपये तक की आमदनी होने की उम्मीद है।
