नई दिल्ली: शादी के बाद महिलाओं का सरनेम बदलना आम बात है, लेकिन क्या सिर्फ नाम बदलने की वजह से बीमा क्लेम रोका जा सकता है? दिल्ली उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने इस मामले में बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। फोरम ने साफ कहा है कि शादी के बाद नाम या सरनेम बदलने को आधार बनाकर किसी महिला का वैध बीमा दावा नहीं रोका जा सकता।
यह फैसला उन लाखों लोगों के लिए राहत लेकर आया है, जिन्हें बैंकिंग और बीमा प्रक्रियाओं में नाम के छोटे अंतर के कारण परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला दिल्ली के यमुना विहार निवासी प्रीति विंडलेश से जुड़ा है। उन्होंने साल 2012 में ‘आईएनजी वैश्य लाइफ इंश्योरेंस’ से एक लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदी थी। बाद में यह कंपनी एक्साइड लाइफ और फिर HDFC Life Insurance में विलय हो गई।
दिसंबर 2023 में पॉलिसी मैच्योर होने पर बीमा कंपनी ने ₹5,12,069 का चेक जारी किया। लेकिन यह चेक महिला के पुराने नाम “प्रीति” पर बनाया गया था, जबकि शादी के बाद उन्होंने अपने बैंक खाते और सभी जरूरी दस्तावेजों में नाम अपडेट कर “प्रीति विंडलेश” करवा लिया था।
बैंक ने नाम मिसमैच बताकर रोका भुगतान
जब महिला ने यह चेक अपने कोटक महिंद्रा बैंक खाते में जमा किया, तो बैंक ने नाम में अंतर होने की वजह से भुगतान से इनकार कर दिया। इसके बाद महिला ने बीमा कंपनी से नया चेक जारी करने की मांग की, लेकिन कंपनी ने तकनीकी कारणों और नाम मिसमैच का हवाला देकर भुगतान रोक दिया।
बीमा कंपनी के रवैये से परेशान होकर महिला ने उत्तर-पूर्वी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
दिल्ली उपभोक्ता फोरम ने लगाई फटकार
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने बीमा कंपनी के व्यवहार को “सेवा में कमी” करार दिया। आयोग की पीठ ने कहा कि केवल शादी के बाद सरनेम बदलने के आधार पर किसी महिला के वैध क्लेम को रोका नहीं जा सकता।
फोरम ने माना कि महिला वही पॉलिसीधारक है और सिर्फ नाम में बदलाव से उसकी पहचान समाप्त नहीं हो जाती, खासकर तब जब उसके सभी आधिकारिक दस्तावेज अपडेट किए जा चुके हों।
कोर्ट ने दिया ब्याज और मुआवजे का आदेश
उपभोक्ता फोरम ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को पूरी मैच्योरिटी राशि लौटाने का आदेश दिया। साथ ही कंपनी पर अतिरिक्त भुगतान का भी निर्देश दिया गया।
कोर्ट के आदेश के अनुसार:
- बीमा कंपनी को ₹5.12 लाख की पूरी राशि का भुगतान करना होगा
- शिकायत दर्ज होने की तारीख से भुगतान तक 9% वार्षिक ब्याज देना होगा
- मानसिक तनाव और परेशानी के लिए ₹45,000 का मुआवजा देना होगा
- कानूनी खर्च के तौर पर ₹20,000 अलग से चुकाने होंगे
बीमा धारकों के लिए क्या है सीख?
यह फैसला उन लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जिन्हें नाम, स्पेलिंग या दस्तावेजों में मामूली अंतर की वजह से बीमा या बैंकिंग सेवाओं में दिक्कतें आती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि शादी के बाद यदि कोई महिला अपना सरनेम बदलती है, तो उसे तुरंत बैंक, बीमा कंपनी और अन्य वित्तीय संस्थानों में अपना नाम अपडेट करवा लेना चाहिए। इसके लिए मैरिज सर्टिफिकेट और जरूरी दस्तावेज जमा करना जरूरी होता है।
इससे भविष्य में क्लेम, बैंक ट्रांजैक्शन या अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में होने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है।
