लिथुआनिया के एक किसान के लिए खेत की सामान्य खुदाई उस समय ऐतिहासिक खोज में बदल गई, जब जमीन के नीचे से 82 साल पुरानी चर्च की घंटी निकल आई। यह घटना कुपिश्किस जिले के अंताशावा कस्बे के पास हुई, जहां किसान लॉरिनास ड्रूजास खेत में खुदाई कर रहे थे। तभी उनके उपकरण किसी भारी धातु की वस्तु से टकराए।
शुरुआत में किसान को लगा कि यह कोई पुराना लोहे का टुकड़ा होगा, लेकिन जैसे-जैसे मिट्टी हटाई गई, एक विशाल चर्च बेल दिखाई देने लगी। यह वही घंटी थी, जिसे स्थानीय लोग द्वितीय विश्व युद्ध के समय से गायब मानते थे। हालांकि यह खोज साल 2024 में हुई थी, लेकिन 2026 में इसका वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह घटना दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गई।
1908 में बनाई गई थी यह चर्च बेल
स्थानीय इतिहासकारों के मुताबिक, यह घंटी सेंट हायसिंथ चर्च की थी और इसे साल 1908 में ढाला गया था। यह घंटी चर्च के टावर में लगी रहती थी, लेकिन 1940 के दशक में अचानक गायब हो गई थी।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि करीब 82 साल तक जमीन के नीचे दबे रहने के बावजूद घंटी काफी अच्छी स्थिति में मिली। इसकी संरचना और आकार लगभग सुरक्षित पाए गए, जिससे इतिहासकार और विरासत विशेषज्ञ भी हैरान रह गए।
गांव वालों ने खुद छिपाई थी घंटी
चर्च के पादरी Rimantas Gudelis के अनुसार, स्थानीय लोगों की पुरानी कहानियों और मौखिक इतिहास से पता चलता है कि गांव वालों ने ही इस घंटी को जमीन में दफनाया था।
उस समय युद्ध का दौर चल रहा था और लोगों को डर था कि कब्जा करने वाली सेना चर्च की घंटी को जब्त कर लेगी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कांस्य और पीतल जैसी धातुओं का इस्तेमाल हथियार और सैन्य उपकरण बनाने में किया जाता था। इसी कारण यूरोप के कई हिस्सों में चर्च की घंटियां उतारकर पिघला दी गई थीं।
युद्ध के दौरान बचाई गई सांस्कृतिक धरोहर
इतिहासकारों के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध में पूरे यूरोप में हजारों चर्च बेल्स जब्त कर ली गई थीं। कई गांवों और समुदायों ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर बचाने के लिए घंटियों को झीलों, जंगलों और जमीन के नीचे छिपा दिया था।
अंताशावा की यह घंटी भी उसी प्रयास का हिस्सा मानी जा रही है। गांव वालों को डर था कि अगर घंटी चर्च में रही, तो उसे भी युद्ध सामग्री बनाने के लिए पिघला दिया जाएगा।
जर्मन और सोवियत कब्जे को लेकर फैली अलग-अलग कहानियां
सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर कई तरह के दावे सामने आए। कुछ लोगों ने कहा कि घंटी को सोवियत सैनिकों से बचाने के लिए छिपाया गया था।
हालांकि इतिहासकारों का कहना है कि 1942 में लिथुआनिया नाजी जर्मनी के कब्जे में था। विशेषज्ञों का मानना है कि घंटी को संभवतः जर्मन प्रशासन के धातु जब्ती अभियान से बचाने के लिए दफनाया गया था।
समय के साथ अलग-अलग पीढ़ियों की कहानियां मिलती चली गईं, जिसकी वजह से इस घटना को लेकर कई तरह की धारणाएं बन गईं।
अब क्या होगा इस ऐतिहासिक घंटी का?
खोज के बाद चर्च अधिकारियों और विरासत विशेषज्ञों ने घंटी की जांच शुरू की। शुरुआती रिपोर्ट्स में यह घंटी काफी हद तक सुरक्षित पाई गई है।
अब विशेषज्ञ यह तय कर रहे हैं कि इसे दोबारा स्थापित करने से पहले किस तरह की मरम्मत और संरक्षण की जरूरत होगी। चर्च प्रशासन को उम्मीद है कि भविष्य में यह ऐतिहासिक घंटी फिर से सेंट हायसिंथ चर्च के टावर में अपनी जगह ले सकेगी।
82 साल तक मिट्टी के नीचे दबी रही यह घंटी आज सिर्फ एक पुरानी वस्तु नहीं, बल्कि युद्धकालीन इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और लोगों की दूरदर्शिता का प्रतीक बन चुकी है।
