नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच पूरी दुनिया की नजर इस समय स्ट्रैट ऑफ होर्मूज पर टिकी हुई है। वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद अहम माने जाने वाले इस समुद्री मार्ग को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहा, तो कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इसके साथ ही दुनिया को एक नई आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
ग्लोबल एनर्जी रिसर्च फर्म Wood Mackenzie और Rapidan Energy Group की रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई है कि होर्मूज स्ट्रेट में संकट लंबा खिंचने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है स्ट्रैट ऑफ होर्मूज?
स्ट्रैट ऑफ होर्मूज दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा सप्लाई रूट्स में शामिल है। वैश्विक स्तर पर लगभग 20% कच्चे तेल और LNG (Liquefied Natural Gas) की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि यह समुद्री मार्ग बंद हो जाता है तो खाड़ी देशों से हर दिन करीब 1.1 करोड़ बैरल तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा सालाना 8 करोड़ टन LNG सप्लाई पर भी असर पड़ने की आशंका है।
Wood Mackenzie के हेड ऑफ इकनॉमिक्स पीटर मार्टिन के मुताबिक, यह केवल एनर्जी संकट नहीं होगा, बल्कि इसका असर वैश्विक व्यापार, उद्योग और आर्थिक विकास पर भी पड़ेगा।
तेल बाजार के सामने तीन बड़े परिदृश्य
विशेषज्ञों ने मौजूदा हालात को लेकर तीन संभावित स्थितियां बताई हैं।
1. Quick Peace Scenario
अगर जून 2026 तक हालात सामान्य हो जाते हैं और समझौता हो जाता है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें धीरे-धीरे कम होकर 2026 के अंत तक 80 डॉलर और 2027 में करीब 65 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती हैं।
2. Summer Settlement Scenario
यदि बातचीत गर्मियों के अंत तक चलती रहती है और होर्मूज स्ट्रेट लंबे समय तक आंशिक रूप से बंद रहता है, तो 2026 की दूसरी छमाही में वैश्विक आर्थिक सुस्ती देखने को मिल सकती है।
3. Extended Disruption Scenario
सबसे गंभीर स्थिति तब मानी जा रही है जब होर्मूज स्ट्रेट 2026 के अंत तक प्रभावित रहता है। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में 0.4% तक गिरावट आ सकती है।
क्यों बढ़ रहा है 2008 जैसी मंदी का डर?
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक Rapidan Energy Group ने चेतावनी दी है कि अगर अगस्त तक होर्मूज स्ट्रेट बंद रहता है, तो दुनिया को 2008 जैसी आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
अगर जुलाई तक रास्ता खुल जाता है, तब भी कच्चे तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इससे वैश्विक तेल मांग में रोजाना 26 लाख बैरल की कमी आने का अनुमान है।
वहीं संकट लंबा खिंचने पर सप्लाई घाटा बढ़कर 60 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। इससे महंगाई तेज होगी, ब्याज दरें ऊंची बनी रहेंगी और आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ेगा।
क्या दुनिया इस संकट से निपट पाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था 1970 या 2008 की तुलना में तेल पर कुछ हद तक कम निर्भर है। साथ ही दुनिया के केंद्रीय बैंक पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं।
हालांकि लगातार महंगे होते तेल से वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। अगर हालात लंबे समय तक बिगड़े रहे, तो एशिया और यूरोप वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से कदम बढ़ा सकते हैं।
दूसरी तरफ अमेरिकी LNG निर्यातकों को इस संकट का बड़ा फायदा मिलने की संभावना जताई जा रही है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कच्चा तेल 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो इसका असर शेयर बाजारों पर भी देखने को मिल सकता है।
- शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ सकती है
- सोने की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है
- जोखिम वाले एसेट्स पर दबाव बढ़ सकता है
- महंगाई और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं
ऐसे में निवेशकों की नजर अब सिर्फ युद्ध पर नहीं, बल्कि होर्मूज स्ट्रेट के खुलने और बंद रहने की स्थिति पर टिकी हुई है।
