भारत और दक्षिण कोरिया के बीच रक्षा सहयोग अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है। पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के रिश्तों में जिस तेजी से मजबूती आई है, उसने एशिया की सामरिक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। खास बात यह है कि चीन की बढ़ती आक्रामकता और क्षेत्रीय दबाव के बावजूद सियोल और नई दिल्ली अब रक्षा क्षेत्र में बड़े स्तर पर साझेदारी बढ़ा रहे हैं।
हाल ही में रक्षा मंत्री Rajnath Singh की दक्षिण कोरिया यात्रा के दौरान कई अहम रक्षा परियोजनाओं और तकनीकी सहयोग पर गंभीर चर्चा हुई। इस दौरान दोनों देशों ने रक्षा उत्पादन, सैन्य तकनीक, समुद्री सुरक्षा और उभरती रक्षा प्रणालियों में सहयोग को और मजबूत करने का संकेत दिया।
भारत-दक्षिण कोरिया रक्षा रिश्तों में क्यों आई तेजी?
दक्षिण कोरिया लंबे समय तक चीन के आर्थिक प्रभाव को देखते हुए भारत के साथ बड़े रक्षा समझौतों में सतर्क रवैया अपनाता रहा। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। बीजिंग की आक्रामक विदेश नीति और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने सियोल को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है।
इसी रणनीतिक बदलाव के तहत दक्षिण कोरिया अब भारत के साथ संयुक्त रक्षा उत्पादन और तकनीकी साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है। दोनों देशों का लक्ष्य केवल घरेलू जरूरतें पूरी करना नहीं, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी संयुक्त रूप से प्रवेश करना है।
सियोल में हुई बड़ी बैठकें
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सियोल में दक्षिण कोरियाई रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक के साथ व्यापक वार्ता की। बातचीत में रक्षा उद्योग, लॉजिस्टिक्स, उन्नत तकनीक, समुद्री सुरक्षा, सैन्य आदान-प्रदान और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषय शामिल रहे।
इसके अलावा भारत और दक्षिण कोरिया ने “KIND-X” यानी Korea-India Defence Innovation Accelerator Ecosystem को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा की। इसका मकसद नई पीढ़ी की रक्षा तकनीकों को संयुक्त रूप से विकसित करना है।
किन रक्षा क्षेत्रों में बढ़ रहा सहयोग?
1. पनडुब्बी तकनीक में साझेदारी
भारत अपने महत्वाकांक्षी Project P-75I के तहत अत्याधुनिक पनडुब्बियां विकसित करना चाहता है। दक्षिण कोरिया की Hanwha Ocean कंपनी इस प्रोजेक्ट में भारत को एडवांस लिथियम-आयन बैटरी और एयर-इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन (AIP) तकनीक देने की दौड़ में आगे मानी जा रही है।
यह तकनीक पनडुब्बियों को लंबे समय तक बिना सतह पर आए समुद्र के भीतर ऑपरेट करने में सक्षम बनाती है।
2. लड़ाकू विमान और एयर डिफेंस सिस्टम
दोनों देशों के बीच दक्षिण कोरिया के KF-21 Boramae फाइटर जेट और FA-50 हल्के लड़ाकू विमान को लेकर बातचीत जारी है। भारतीय सेना पर्वतीय क्षेत्रों में ड्रोन और दुश्मन के एयर थ्रेट से निपटने के लिए दक्षिण कोरिया के K30 Biho एयर डिफेंस सिस्टम में भी रुचि दिखा रही है।
संभावना है कि इन रक्षा प्रणालियों का निर्माण भारत में “मेक इन इंडिया” मॉडल के तहत किया जाए।
3. मिसाइल और लेजर हथियार
भारत और दक्षिण कोरिया भविष्य के हाई-एनर्जी लेजर वेपन्स विकसित करने पर भी काम कर सकते हैं। यह तकनीक ड्रोन, मिसाइल और एयर थ्रेट को हवा में ही खत्म करने में सक्षम मानी जाती है।
इसके अलावा AI आधारित रक्षा प्लेटफॉर्म और स्मार्ट वेपन सिस्टम पर भी सहयोग बढ़ रहा है।
K9 वज्र तोप बना साझेदारी का मजबूत आधार
भारत और दक्षिण कोरिया पहले से K9 Vajra-T हॉवित्जर तोप का संयुक्त उत्पादन कर रहे हैं। दक्षिण कोरिया की Hanwha Aerospace और भारत की Larsen & Toubro मिलकर इसका निर्माण कर रही हैं।
यह प्रोजेक्ट दोनों देशों की रक्षा साझेदारी का सबसे सफल उदाहरण माना जाता है।
चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश
भारत और दक्षिण कोरिया दोनों अब सप्लाई चेन और रक्षा तकनीक के मामले में चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। इसी वजह से दोनों देशों ने “Economic Security Dialogue” शुरू किया है।
इस पहल का उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और महत्वपूर्ण कच्चे माल की सप्लाई को सुरक्षित बनाना है।
भारत को क्या फायदा होगा?
भारत के लिए यह साझेदारी कई मायनों में अहम मानी जा रही है:
- आधुनिक रक्षा तकनीक तक पहुंच
- स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा
- रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी
- चीन के क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करना
- रूस पर निर्भरता कम करना
दक्षिण कोरिया को क्या मिलेगा?
दक्षिण कोरिया भारत की विशाल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और बड़े रक्षा बाजार का फायदा उठाना चाहता है। भारत के साथ मिलकर वह दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका के उभरते रक्षा बाजारों में प्रवेश कर सकता है।
आने वाले समय में क्या बदल सकता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और दक्षिण कोरिया की यह बढ़ती रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में एशिया की शक्ति संतुलन राजनीति पर बड़ा असर डाल सकती है। चीन जिस तरह भारत को उसके पड़ोसी देशों के जरिए घेरने की कोशिश करता रहा है, अब भारत भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने रणनीतिक साझेदार मजबूत कर रहा है।
भारत-दक्षिण कोरिया रक्षा सहयोग अब सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह तकनीक, उत्पादन और वैश्विक रणनीतिक साझेदारी का नया मॉडल बनता जा रहा है।
