India और Cyprus ने अपने रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाते हुए द्विपक्षीय संबंधों को अब “रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा देने का फैसला किया है। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री Narendra Modi और साइप्रस के राष्ट्रपति Nikos Christodoulides के बीच हुई अहम बैठक के बाद दोनों देशों ने रक्षा, साइबर सुरक्षा, समुद्री परिवहन, अंतरिक्ष और स्वास्थ्य जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई।
विशेष रूप से रक्षा सहयोग के लिए पांच साल का रोडमैप तैयार किया गया है, जिसे क्षेत्रीय रणनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। इसके साथ ही दोनों देशों ने साइबर सुरक्षा पर औपचारिक वार्ता शुरू करने और आतंकवाद विरोधी सहयोग को मजबूत बनाने का भी निर्णय लिया है।
छह बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर
भारत और साइप्रस के बीच हुई इस उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान कुल छह महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें शामिल हैं:
- आतंकवाद-रोधी संयुक्त कार्य समूह का गठन
- राजनयिक प्रशिक्षण में सहयोग
- नवाचार और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में साझेदारी
- खोज और बचाव अभियानों में समन्वय
- उच्च शिक्षा और अनुसंधान सहयोग
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान समझौता
इन समझौतों को भारत की भूमध्यसागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी के तौर पर देखा जा रहा है।
तुर्की और साइप्रस के तनाव का क्या है मामला?
Turkey और साइप्रस के बीच लंबे समय से पूर्वी भूमध्यसागर में विवाद जारी है। इस तनाव के पीछे मुख्य कारण समुद्री सीमाएं, प्राकृतिक गैस भंडार और द्वीप का राजनीतिक विभाजन है।
पूर्वी भूमध्यसागर में बड़े पैमाने पर गैस और हाइड्रोकार्बन संसाधनों की खोज के बाद यह क्षेत्र और ज्यादा संवेदनशील बन गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त साइप्रस सरकार ने अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में ऊर्जा खोज की अनुमति दी, लेकिन तुर्की ने इसका विरोध किया।
साइप्रस संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून समझौते (UNCLOS) के आधार पर अपने समुद्री अधिकारों का दावा करता है, जबकि तुर्की इस समझौते का हिस्सा नहीं है। तुर्की का मानना है कि छोटे द्वीपों को इतने बड़े समुद्री क्षेत्र का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
‘ब्लू होमलैंड’ नीति से बढ़ा तनाव
तुर्की पिछले कुछ वर्षों से अपनी “ब्लू होमलैंड” रणनीति को आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रहा है। इस नीति के तहत वह पूर्वी भूमध्यसागर के बड़े हिस्से में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत और साइप्रस की नई रणनीतिक साझेदारी को तुर्की अपने हितों के खिलाफ एक संकेत के तौर पर देख सकता है।
भारत-साइप्रस साझेदारी क्यों मानी जा रही है अहम?
हालांकि साइप्रस एक छोटा देश है और उसकी सैन्य ताकत सीमित मानी जाती है, लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। यह देश प्रस्तावित India-Middle East-Europe Economic Corridor परियोजना के संभावित मार्ग पर स्थित है, जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच व्यापार और ऊर्जा संपर्क को मजबूत करना है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी भूमध्यसागर में गैस भंडारों के कारण साइप्रस भविष्य में भारत के लिए ऊर्जा सहयोग का अहम साझेदार बन सकता है।
1974 से बंटा हुआ है साइप्रस
साइप्रस का राजनीतिक संकट 1974 में और गहरा गया था, जब तुर्की ने द्वीप के उत्तरी हिस्से पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद से साइप्रस दो हिस्सों में बंटा हुआ है। आज भी दोनों पक्षों के बीच तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
विश्लेषकों के अनुसार भारत की बढ़ती सक्रियता तुर्की को रणनीतिक संदेश देने की कोशिश भी मानी जा रही है।
पाकिस्तान-तुर्की संबंधों का भी असर?
राजनयिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि भारत अब उन देशों के खिलाफ ज्यादा सक्रिय रणनीति अपना रहा है जो खुलकर पाकिस्तान का समर्थन करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में तुर्की ने कई मौकों पर पाकिस्तान के पक्ष में बयान दिए हैं और कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया है।
इसी वजह से भारत और साइप्रस के बीच बढ़ती नजदीकियों को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि भारत आधिकारिक तौर पर इसे केवल रणनीतिक और आर्थिक सहयोग बता रहा है।
साइबर और नौसैनिक सहयोग पर रहेगा फोकस
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत साइप्रस की साइबर सुरक्षा क्षमताओं और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने में सहयोग कर सकता है। इसके अलावा हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े मंचों में साइप्रस की भागीदारी भी बढ़ सकती है।
साइप्रस अब भारत की अगुवाई वाली हिंद-प्रशांत महासागर पहल में भी शामिल हो चुका है, जिसे भारत की वैश्विक रणनीतिक पहुंच के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।
निष्कर्ष
भारत और साइप्रस के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी सिर्फ द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूर्वी भूमध्यसागर और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति पर भी पड़ सकता है। रक्षा, साइबर सुरक्षा और ऊर्जा सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की नजदीकियां आने वाले समय में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को नई दिशा दे सकती हैं।
