पिछले कुछ वर्षों में Artificial Intelligence को लेकर दुनिया भर में जबरदस्त उत्साह देखा गया। बड़ी टेक कंपनियों ने दावा किया कि AI इंसानों से तेज काम करेगा, लागत घटाएगा और कंपनियों का मुनाफा बढ़ाएगा। इसी सोच के चलते कई कंपनियों ने कर्मचारियों की छंटनी कर AI आधारित टूल्स, कोडिंग एजेंट्स और ऑटोमेशन सिस्टम को तेजी से अपनाया।
लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। जिन कंपनियों ने AI को सस्ता और फायदे का सौदा समझा था, वही अब बढ़ते AI खर्चों से परेशान नजर आ रही हैं। कई रिपोर्ट्स में सामने आया है कि AI सिस्टम चलाने का खर्च कई जगह कर्मचारियों की सैलरी से भी ज्यादा हो गया है।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं AI के बिल?
AI मॉडल और कोडिंग एजेंट आमतौर पर “टोकन” के आधार पर काम करते हैं। जब कोई AI कोड लिखता है, डॉक्यूमेंट पढ़ता है, डेटा प्रोसेस करता है या किसी गलती को ठीक करता है, तब वह बड़ी संख्या में टोकन इस्तेमाल करता है।
समस्या तब और बढ़ जाती है जब इंजीनियर्स एक साथ कई AI एजेंट्स को बैकग्राउंड में चलाने लगते हैं। इससे टोकन की खपत तेजी से बढ़ती है और कंपनियों के बिल लाखों डॉलर तक पहुंच जाते हैं।
कंपनियों का खर्च पहुंचा रिकॉर्ड स्तर पर
NVIDIA के वाइस प्रेसिडेंट ब्रायन कैटानजारो ने स्वीकार किया कि उनकी टीम में कंप्यूटिंग लागत अब कर्मचारियों की सैलरी से भी ज्यादा हो चुकी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ हैवी AI यूजर्स का मासिक बिल 150,000 डॉलर यानी लगभग 1.25 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। स्टॉकहोम के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर मैक्स लिंडर ने बताया कि वे अकेले Claude AI पर अपनी सैलरी से ज्यादा खर्च कर रहे हैं।
‘Tokenmaxxing’ बना नया ट्रेंड
AI इंडस्ट्री में अब “Tokenmaxxing” नाम का नया ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसका मतलब है कि डेवलपर्स ज्यादा प्रोडक्टिविटी और तेजी से काम पूरा करने के लिए हर दिन लाखों टोकन खर्च कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रेंड कंपनियों की लागत को तेजी से बढ़ा रहा है, क्योंकि कई इंजीनियर्स बिना सीमाओं के AI एजेंट्स का उपयोग कर रहे हैं।
उबर जैसी कंपनियों का बजट भी प्रभावित
एक रिपोर्ट के अनुसार Uber के इंजीनियर्स ने Anthropic के Claude Code प्लेटफॉर्म का इतना ज्यादा इस्तेमाल किया कि कंपनी का 2026 का AI बजट तय समय से पहले ही खत्म हो गया।
इससे साफ है कि AI टूल्स की लोकप्रियता जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से कंपनियों की लागत भी बढ़ती जा रही है।
AI से बन रहा है बड़ी मात्रा में कोड
बढ़ते खर्चों के बावजूद टेक कंपनियों में AI का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। Anthropic के Claude Code विभाग के प्रमुख बोरिस चेर्नी के अनुसार उनकी कंपनी का लगभग पूरा कोड अब AI की मदद से तैयार हो रहा है।
वहीं Google और Microsoft जैसी कंपनियों में करीब 25% कोड AI आधारित सिस्टम से जनरेट किया जा रहा है।
Meta ने तो कर्मचारियों के परफॉर्मेंस रिव्यू में भी AI के इस्तेमाल को शामिल करना शुरू कर दिया है।
आखिर फायदा किसे हो रहा है?
AI के बढ़ते उपयोग का सबसे बड़ा लाभ AI प्लेटफॉर्म बनाने वाली कंपनियों को मिल रहा है। OpenAI, Anthropic और Microsoft जैसी कंपनियां बढ़ती मांग के कारण अपनी सेवाओं की कीमतें बढ़ा रही हैं और नए बिलिंग मॉडल लागू कर रही हैं।
Microsoft ने GitHub Copilot के लिए “Usage-Based Billing” मॉडल शुरू किया है, जिसमें जितना ज्यादा इस्तेमाल होगा, उतना ज्यादा शुल्क देना होगा।
क्या AI अब सस्ता विकल्प नहीं रहा?
शुरुआत में कंपनियों को लगा था कि AI कर्मचारियों की जगह लेकर लागत कम करेगा, लेकिन अब कई विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े पैमाने पर AI चलाना बेहद महंगा साबित हो सकता है।
AI मॉडल्स को चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग पावर, डेटा प्रोसेसिंग और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है, जिसका खर्च लगातार बढ़ रहा है।
आगे क्या हो सकता है?
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में कंपनियां AI उपयोग के लिए सख्त सीमाएं और बजट नियंत्रण लागू कर सकती हैं। साथ ही AI टूल्स के इस्तेमाल को लेकर नई नीतियां भी बनाई जा सकती हैं।
हालांकि इतना तय माना जा रहा है कि AI का प्रभाव टेक इंडस्ट्री में लगातार बढ़ता रहेगा, लेकिन अब कंपनियां सिर्फ प्रोडक्टिविटी नहीं बल्कि उसके वास्तविक खर्च पर भी गंभीरता से ध्यान देने लगी हैं।
निष्कर्ष
AI ने काम करने का तरीका तेजी से बदल दिया है, लेकिन इसके बढ़ते टोकन और कंप्यूटिंग खर्च ने टेक कंपनियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। जिन AI टूल्स को कभी लागत कम करने वाला समाधान माना जा रहा था, वही अब कई कंपनियों के लिए भारी वित्तीय बोझ बनते दिखाई दे रहे हैं।
