मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में दो बार बढ़ोतरी हो चुकी है और आगे भी दाम बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। लेकिन अब आम लोगों के लिए एक और बड़ा झटका सामने आ सकता है।
दरअसल, भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और इसकी गिरावट ने सरकार के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की चिंता भी बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के स्तर तक पहुंच सकता है।
एक साल में रुपये में बड़ी गिरावट
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले एक साल में भारतीय करेंसी में 10 से 12 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। रुपये की कमजोरी का सीधा असर आयात, महंगाई और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
इसी वजह से RBI अब कई बड़े कदम उठाने की तैयारी में जुट गया है ताकि रुपये को और कमजोर होने से रोका जा सके।
RBI बढ़ा सकता है रेपो रेट
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को स्थिर करने के लिए रेपो रेट बढ़ाने पर विचार कर सकता है। इसके अलावा विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने और डॉलर जुटाने के विकल्पों पर भी चर्चा चल रही है।
अगर RBI रेपो रेट में बढ़ोतरी करता है, तो इसका सीधा असर बैंक लोन पर पड़ेगा। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI बढ़ सकती है, जिससे मिडिल क्लास की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
97 के करीब पहुंचा रुपया, बढ़ी टेंशन
बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले नए रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया। बताया जा रहा है कि 97 के स्तर के आसपास पहुंचने के बाद RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति पर चर्चा के लिए आंतरिक बैठकें कीं।
कमजोर रुपया भारत के आयात बिल को बढ़ाता है, खासकर तब जब देश पहले से महंगे तेल और वैश्विक संकट का सामना कर रहा हो।
कौन-कौन से कदम उठा सकता है RBI?
रिपोर्ट्स के अनुसार, RBI के पास कई विकल्प मौजूद हैं। इनमें सबसे प्रमुख रेपो रेट में बढ़ोतरी मानी जा रही है। RBI की अगली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक 3 से 5 जून के बीच होनी है, जिसमें ब्याज दरों को लेकर बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
इसके अलावा RBI विदेशों से डॉलर जुटाने के लिए NRI डिपॉजिट स्कीम और सॉवरेन डॉलर बॉन्ड जैसे विकल्पों पर भी काम कर रहा है।
2013 जैसे हालात दोहराने की तैयारी?
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा रणनीति काफी हद तक 2013 के “टेपर टैंट्रम” दौर जैसी दिखाई दे रही है। उस समय भी भारत ने विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए NRI डिपॉजिट योजनाएं शुरू की थीं।
बताया जा रहा है कि इस बार ऐसी योजनाओं के जरिए करीब 50 अरब डॉलर तक जुटाने का लक्ष्य रखा जा सकता है, जबकि 2013 में यह आंकड़ा लगभग 30 अरब डॉलर था।
मिडिल क्लास पर बढ़ सकता है बोझ
अगर रुपये में गिरावट जारी रहती है और RBI ब्याज दरें बढ़ाता है, तो इसका सबसे ज्यादा असर मिडिल क्लास परिवारों पर पड़ सकता है। बढ़ती EMI, महंगा पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा की बढ़ती कीमतें आम लोगों के बजट को और बिगाड़ सकती हैं।
अब सभी की नजर RBI की जून में होने वाली बैठक पर टिकी है, जहां आने वाले महीनों की आर्थिक दिशा तय हो सकती है।
