होर्मुज संकट और एथेनॉल ब्लेंडिंग के बीच भारत की ईंधन नीति बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। पेट्रोल में एथेनॉल की बढ़ती हिस्सेदारी से आयात निर्भरता घटेगी, किसानों को लाभ मिलेगा और लंबी अवधि में दामों पर दबाव कम हो सकता है.
भारत की ईंधन नीति अब एक बड़े मोड़ पर है। होर्मुज संकट और वैश्विक तेल-उछाल के बीच सरकार पेट्रोल पर आयात-निर्भरता घटाने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही है, और इसी पर आधारित 600 शब्दों की यह रिपोर्ट तैयार की गई है.
मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेज हुई हैं, और इससे आयात-आधारित देशों पर दबाव बढ़ा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए हर वैश्विक झटका सीधे ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी मुद्रा भंडार पर असर डालता है.
इसी पृष्ठभूमि में सरकार पेट्रोल की कीमतों को स्थिर रखने और भविष्य में घटाने के लिए वैकल्पिक ईंधन को प्राथमिकता दे रही है.
एथेनॉल ब्लेंडिंग क्या है
एथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब है पेट्रोल में निश्चित अनुपात में एथेनॉल मिलाना। एथेनॉल गन्ने के रस, शीरे, मक्का, धान, गेहूं और कुछ कृषि-आधारित अवशेषों से बनाया जाता है. देश में अभी E20 यानी 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल लागू है, जबकि 100% एथेनॉल मिश्रण यानी E100 की ओर बढ़ने की चर्चा तेज हो गई है. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में 100% एथेनॉल ब्लेंडिंग की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने की बात कही, जिसे उन्होंने ऊर्जा आत्मनिर्भरता से जोड़ा.
सरकार का प्लान
सरकार का मकसद सिर्फ पेट्रोल के दाम कम करना नहीं, बल्कि आयात बिल घटाकर दीर्घकालिक सुरक्षा बनाना है। पीएम मोदी पहले ही एथेनॉल ब्लेंडिंग को “गेम चेंजर” बता चुके हैं और संसद में यह रेखांकित किया गया कि E20 से तेल आयात में उल्लेखनीय कमी आई है.
रिपोर्ट्स के अनुसार E20 मिश्रण से करीब 4.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल का आयात बचा और लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हुई. इसी वजह से अब सरकार एथेनॉल उत्पादन, खरीद और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के इकोसिस्टम को साथ-साथ बढ़ाना चाहती है.
₹60-70 लीटर का दावा
पेट्रोल के 60-70 रुपये प्रति लीटर तक आने का दावा सुर्खी भले बनता है, लेकिन इसे सीधे-सीधे मौजूदा बाजार दाम समझना ठीक नहीं होगा। यह राहत तभी संभव है जब एथेनॉल उत्पादन बड़े स्तर पर बढ़े, सप्लाई चेन सस्ती हो, टैक्स ढांचा अनुकूल हो और फ्यूल की लागत पर लगातार दबाव घटे. वर्तमान में E20 पेट्रोल की कीमत सामान्य पेट्रोल के आसपास ही रहने की एक बड़ी वजह लागत और वितरण संरचना है. यानी 60-70 रुपये का स्तर एक संभावित दीर्घकालिक लक्ष्य हो सकता है, लेकिन इसे तात्कालिक परिणाम मानना भ्रम होगा.
किसानों और उद्योग पर असर
एथेनॉल को केवल ईंधन नीति नहीं, बल्कि कृषि-आधारित आर्थिक मॉडल भी माना जा रहा है। इससे गन्ना, मक्का और दूसरी फसलों की मांग बढ़ती है, जिससे किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलता है. सरकार के लिए यह आयात घटाने का रास्ता है, उद्योग के लिए नया निवेश अवसर है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए आय का स्रोत भी बन सकता है. लेकिन इसकी सफलता के लिए उत्पादन क्षमता, कीमतों की स्थिरता और खरीद नीति का संतुलन जरूरी होगा.
चुनौतियां भी कम नहीं
हर मौजूदा वाहन 100% एथेनॉल पर नहीं चल सकता, इसलिए फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स का विस्तार जरूरी है. इसके अलावा एथेनॉल की ऊर्जा घनता पेट्रोल से कम होती है, जिससे पुराने वाहनों में माइलेज घटने और तकनीकी अनुकूलता की चिंता बनी रहती है. उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक लंबे समय की सफलता केवल मिश्रण प्रतिशत बढ़ाने से नहीं, बल्कि वाहन तकनीक, रिफाइनरी अनुकूलन और सटीक नीति-समन्वय से आएगी.
